अवैध कॉलोनी को 75% विकसित बताने वाली रिपोर्ट पर उठे सवाल, पालिका CMO के खिलाफ कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत
पहले अवैध कॉलोनी बताकर ₹71.65 लाख के निर्माण कार्य निरस्त, 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के लिए मार्ग संरचना अनुमोदन का प्रस्ताव भेजने का आरोप
गरियाबंद। नगर पालिका परिषद गरियाबंद के वार्ड क्रमांक 15 में होटल सिटी रिजेंसी के समीप विकसित बताई जा रही कथित अवैध कॉलोनी को लेकर प्रशासनिक स्तर पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में नगर पालिका परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) के विरुद्ध कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत प्रस्तुत की गई है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कॉलोनी की वास्तविक स्थिति के विपरीत रिपोर्ट तैयार कर उच्च कार्यालयों को भेजी गई तथा कथित रूप से कॉलोनी को लगभग 75 प्रतिशत विकसित बताया गया।
शिकायतकर्ता जुनैद खान, वार्ड क्रमांक 15, गरियाबंद ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि कृषि भूमि पर कथित अवैध प्लाटिंग और कॉलोनाइजर एक्ट के प्रावधानों के उल्लंघन के बावजूद संबंधित मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। शिकायत में नगर पालिका के अधिकारी द्वारा वास्तविक तथ्यों के विपरीत रिपोर्ट भेजे जाने का भी आरोप लगाया गया है।
75 प्रतिशत विकसित बताने वाली रिपोर्ट पर सवाल
शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कथित तौर पर तैयार की गई उस रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसमें संबंधित कॉलोनी को करीब 75 प्रतिशत विकसित बताया गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि मौके की वास्तविक स्थिति और उपलब्ध दस्तावेजों की तुलना किए जाने पर इस रिपोर्ट की तथ्यात्मकता की जांच आवश्यक है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि यदि किसी ऐसे क्षेत्र को, जिसे पूर्व में अवैध कॉलोनी के रूप में माना गया हो, उच्च कार्यालयों को भेजी गई रिपोर्ट में विकसित कॉलोनी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, तो यह प्रशासनिक स्तर पर गंभीर विषय है।
हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही हो सकेगी।
₹71.65 लाख के निर्माण कार्य निरस्त करने के बाद बदला रुख?
मामले को और गंभीर बनाने वाला दूसरा पहलू नगर पालिका परिषद गरियाबंद के कथित आधिकारिक पत्राचार से जुड़ा बताया जा रहा है।
शिकायत से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, नगर पालिका परिषद ने पहले इसी क्षेत्र को कथित अवैध कॉलोनी मानते हुए वहां प्रस्तावित लगभग ₹71.65 लाख के सीसी रोड, आरसीसी ड्रेन और आरसीसी कलवर्ट से संबंधित निर्माण कार्यों को निरस्त कर दिया था।
लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके महज 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के लिए नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के समक्ष मार्ग संरचना अनुमोदन का प्रस्ताव भेज दिया गया।
यहीं से पूरे मामले में प्रशासनिक निर्णयों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होता है।
बड़ा सवाल:
जब संबंधित क्षेत्र को अवैध कॉलोनी मानते हुए वहां लाखों रुपये के विकास कार्य निरस्त किए गए थे, तो केवल 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के लिए मार्ग संरचना अनुमोदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या इस बीच कोई नया प्रशासनिक निर्णय हुआ था?
क्या कॉलोनी की वैधानिक स्थिति में कोई बदलाव आया था?
क्या संबंधित भूमि और प्लाटिंग को लेकर कोई नया अनुमोदन प्राप्त हुआ था?
या फिर दोनों पत्राचार अलग-अलग प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत किए गए थे?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
कृषि भूमि पर प्लाटिंग और कॉलोनाइजर एक्ट का मुद्दा
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि संबंधित क्षेत्र में कृषि भूमि पर प्लाटिंग की गई और कॉलोनाइजर एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। ऐसे में यह जांच का विषय बनता है कि संबंधित भूमि का उपयोग किस आधार पर किया गया और प्लाटिंग अथवा कॉलोनी विकास के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियां प्राप्त थीं या नहीं।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि नगर एवं ग्राम निवेश विभाग, राजस्व विभाग और नगर पालिका के रिकॉर्ड में संबंधित भूमि और कॉलोनी की स्थिति क्या दर्ज है।
यदि अलग-अलग विभागों के दस्तावेजों में क्षेत्र की स्थिति अलग-अलग दिखाई देती है, तो उनके बीच के प्रशासनिक विरोधाभास की जांच किया जाना आवश्यक हो जाता है।
RTI दस्तावेजों के आधार पर शिकायत
शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत के साथ कई दस्तावेज संलग्न किए हैं। इनमें नगर पालिका परिषद गरियाबंद से सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी, तहसीलदार कार्यालय से संबंधित दस्तावेज, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग से प्राप्त जानकारी, कलेक्टर कार्यालय गरियाबंद का 23 फरवरी 2026 का पत्र तथा नगर एवं ग्राम निवेश विभाग, रायपुर से संबंधित दस्तावेज शामिल बताए गए हैं।
इन दस्तावेजों को आधार बनाकर शिकायतकर्ता ने आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।
क्या किसी को लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई?
शिकायत में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि कथित अवैध कॉलोनी से जुड़े लोगों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से प्रशासनिक स्तर पर तथ्यों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया हो सकता है।
हालांकि, यह फिलहाल शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप और आशंका हैं। इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर गलत तथ्य प्रस्तुत किए, सरकारी रिकॉर्ड में भ्रामक जानकारी दी या किसी व्यक्ति अथवा समूह को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अपने पद का इस्तेमाल किया, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय हो सकती है।
जांच में किन बिंदुओं पर होनी चाहिए पड़ताल?
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के दौरान कुछ प्रमुख बिंदुओं की जांच महत्वपूर्ण मानी जा सकती है—
1. संबंधित भूमि का मूल स्वामित्व एवं वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड क्या है?
2. भूमि का उपयोग कृषि से आवासीय अथवा अन्य प्रयोजन में परिवर्तित हुआ या नहीं?
3. संबंधित प्लाटिंग अथवा कॉलोनी विकास के लिए आवश्यक अनुमतियां ली गई थीं या नहीं?
4. नगर पालिका ने किस आधार पर क्षेत्र को अवैध कॉलोनी माना था?
5. ₹71.65 लाख के सीसी रोड, आरसीसी ड्रेन एवं आरसीसी कलवर्ट कार्यों को निरस्त करने का आधार क्या था?
6. इसके 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के लिए मार्ग संरचना अनुमोदन का प्रस्ताव किस अधिकारी अथवा किस निर्णय के आधार पर भेजा गया?
7. उच्च कार्यालय को भेजी गई रिपोर्ट में कॉलोनी को लगभग 75 प्रतिशत विकसित बताए जाने का आधार क्या था?
8. क्या रिपोर्ट तैयार करने से पहले मौके का निरीक्षण किया गया था?
9. यदि निरीक्षण किया गया था तो निरीक्षण रिपोर्ट में क्या तथ्य दर्ज हैं?
10. अलग-अलग विभागों के पत्राचार में यदि विरोधाभास है तो उसकी वजह क्या है?
प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी उठे सवाल
यह पूरा मामला केवल एक कथित अवैध कॉलोनी तक सीमित नहीं है। इसमें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज अलग-अलग तथ्यों और प्रशासनिक निर्णयों के बीच सामंजस्य का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
एक तरफ संबंधित क्षेत्र में विकास कार्यों को कथित अवैध कॉलोनी का हवाला देते हुए निरस्त किए जाने की बात सामने आती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ ही दिनों बाद उसी क्षेत्र के लिए मार्ग संरचना अनुमोदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने का आरोप है।
ऐसे में यह जरूरी है कि संबंधित सभी दस्तावेजों, नोटशीट, निरीक्षण रिपोर्ट, प्रस्ताव, अनुमोदन और विभागीय पत्राचार को एक साथ रखकर जांच की जाए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
शिकायतकर्ता ने की FIR और विभागीय कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता जुनैद खान ने कलेक्टर जनदर्शन में प्रस्तुत शिकायत में पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और गहन जांच कराने की मांग की है।
शिकायत में कहा गया है कि यदि जांच में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित मुख्य नगर पालिका अधिकारी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के साथ कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।
साथ ही शिकायतकर्ता ने कथित अवैध कॉलोनी की वास्तविक वैधानिक स्थिति सार्वजनिक किए जाने की मांग भी की है।
अब निगाह प्रशासन की जांच पर
फिलहाल पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि प्रशासन शिकायत में प्रस्तुत दस्तावेजों और आरोपों की किस स्तर पर जांच कराता है। यदि जांच समिति अथवा सक्षम अधिकारी द्वारा नगर पालिका, राजस्व विभाग और नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड का तुलनात्मक परीक्षण किया जाता है, तो कथित प्रशासनिक विरोधाभास की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
विशेष रूप से ₹71.65 लाख के निर्माण कार्य निरस्तीकरण और उसके 17 दिन बाद मार्ग संरचना अनुमोदन प्रस्ताव के बीच की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया जांच का अहम हिस्सा बन सकती है।
वहीं, 75 प्रतिशत विकास संबंधी रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई और उसमें मौके की वास्तविक स्थिति का कितना आकलन किया गया—यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु रहेगा।
TildaTimesCGNews की नजर इस मामले में होने वाली आगामी प्रशासनिक कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों पर बनी रहेगी।





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